स्टाम्प व रजिस्ट्रेषन विभाग का नागरिक चार्टर


1- भूमिका


निबन्धन विभाग का उद्देश्य लेखपत्रों के पंजीकरण की ऐसी सार्वजनिक व्यवस्था की स्थापना से है, जिसमें सम्पत्तियों के अन्तरण के सम्बन्ध में पक्षकारों के बीच तय होने वाले अधिकारों अथवा दायित्वों की संविदा को अधिकारिक तौर पर अंकित किया जा सके तथा आवश्यकतानुसार उन्हें सार्वजनिक उपयोग हेतु उपलब्ध कराया जा सके। इसका उद्देश्य पक्षकारों के मध्य निष्पादित लेखपत्रों को वैधानिक महत्व प्रदान करना तथा धोखाधड़ी के कृत्यों को रोकना भी है। निबन्धन हेतु प्रस्तुत होने वाले लेखपत्रों पर स्टाम्प शुल्क का अधिरोपण करने से राज्य को महत्वपूर्ण राजस्व की प्राप्ति भी हो रही है। वर्तमान में रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 तथा भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 के अन्र्तगत ही इस समूची व्यवस्था का प्रदेश में संचालन किया जा रहा है। प्रदेश में प्रति वर्ष लगभग 23 लाख विलेख पंजीकरण हेतु विभिन्न कार्यालयों में प्रस्तुत होते है, जिसका अर्थ है कि प्रति वर्ष लगभग एक करोड़ व्यक्ति निबन्धन विभाग के सम्पर्क में किसी न किसी कार्यवश आते है। इस प्रकार स्टाम्प तथा निबन्धन विभाग जनता के साथ सम्पर्क में आने वाले तथा उन्हें सेवाऐं प्रदान करने वाला एक सबसे महत्वपूर्ण विभाग है। इस विभाग के विभिन्न कार्यालयों से तथा वहाॅ कार्यरत कर्मचारियों से जनता को क्या अपेक्षाएं होनी चाहिए तथा उन्हें किस प्रकार की सेवायें प्राप्त होनी चाहिये, इसकी घोषणा करते हुए जन-जन को इससे अवगत कराने के लिए यह नागरिक चार्टर बनाया गया है

2- विभागीय ढ़ाँचा


प्रषासन स्तर पर स्टाम्प व निबन्धन विभाग, कर एवं निबन्धन विभाग द्वारा नियन्त्रित होता है, जिसका नेतृत्व मा0 पंजीयन मंत्री जी तथा प्रमुख सचिव, कर एवं निबन्धन विभाग द्वारा किया जाता है। इसके विभागाध्यक्ष, महानिरीक्षक निबन्धन, उत्तर प्रदेष होते है, जो स्टाम्प आयुक्त तथा अपर सचिव, उत्तर प्रदेष राजस्व परिषद भी होते हैं। इसका मुख्यालय 1, सरोजनी नायडू मार्ग, इलाहाबाद- 211001 में है तथा शिविर कार्यालय द्वितीय तल, विष्वास कामर्षियल काम्पलेक्स, विष्वास खन्ड-3, गोमती नगर, लखनऊ-226010 में स्थापित है। स्टाम्प-पत्रों के मुद्रण का कार्य भारत प्रतिभूमि मुद्रणालय, नासिक रोड (महाराश्ट्र) तथा सिक्योरिटी प्रिन्टिग प्रेस, हैदराबाद में होता है। अपर सचिव, उत्तर प्रदेष राजस्व परिशद, लखनऊ के मार्गदर्षन में कानपुर कोशागार के अधिकारी प्रदेष के लिये स्टाम्पों को सड़क मार्ग से लाते है तथा अन्य मण्डलों को उनकी मांग व आवष्यकतानुसार वितरित करते है। उप निबन्धक कार्यालयों द्वारा सम्पादित होने वाले पंजीयन की कमियों के निरीक्षण का कार्य स्टाम्प वादों के निस्तारण की समीक्षा का कार्य तथा रजिस्ट्रीकरण अधिनियम,1908 के अन्तर्गत सुचारू रूप से कार्य सम्पादन हेतु नियम निर्माण का कार्य महानिरीक्षक निबन्धन, उत्तर प्रदेष द्वारा सम्पादित किया जाता है। जनपद के स्तर पर अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) पदेन जिला-निबन्धक का कार्य देखते हैं। जिलाधिकारी द्वारा इन्हें जिला स्टाम्प अधिकारी की शक्तियाँ भी प्रदान की गई हैं। उप निबन्धक कार्यालयों में अपने-अपने क्षेत्राधिकार के अनुसार लेखपत्रों का पंजीकरण किया जाता है। समुचित कारण होने पर जिला निबन्धक कार्यालय में भी लेखपत्रों का पंजीकरण हो सकता है। ऐसे लेखपत्रों पर जिनके बारे में स्टाम्प शुल्क की देयता के बारे में संदिग्धता हो या इनमें कमी स्टाम्प हो, उन पर सही स्टाम्प शुल्क का निर्धारण कलेक्टर की शक्तियों का उपयोग करते हुए जिला कलेक्टर, अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) उप/सहायक आयुक्त स्टाम्प तथा अन्य प्राधिकृत अपर जिलाधिकारी/ परगनाधिकारी आदि के द्वारा किया जाता है। कलेक्टर के निर्णय के विरूद्व अपनी-अपनी शक्तियों के अनुसार सम्बन्धित मण्डल के उप आयुक्त स्टाम्प, अपर आयुक्त, आयुक्त अथवा मुख्य नियन्त्रक राजस्व प्राधिकारी -सदस्य, राजस्व परिषद द्वारा रिवीजन /अपील वाद सुना जाता है। जिला स्तर पर उप निबन्धकों तथा अन्य विभागीय कर्मियों पर उप/सहायक महानिरीक्षक निबन्धन का नियन्त्रण रहता है, जो पदेन उप/सहायक आयुक्त, स्टाम्प भी होते हैं तथा उप निबन्धक कार्यालयों में पंजीकृत होने वाले विलेखों का निरीक्षण करते हुए यह अधिकारी करापवंचन के मामलों का पता लगाकर स्टाम्प वाद प्रारम्भ करने की संस्तुति कलेक्टर को करते हैं। विभिन्न स्तर के अधिकारियों के उपरोक्त कार्यक्षेत्रों एवं कर्तव्यों को देखते हुए कोई भी व्यक्ति उनसे आवश्यकतानुसारv सम्पर्क कर सकता है एवं उचित कारण होने पर शिकायत कर सकता है।

4- जनता के मार्गदर्शन हेतु अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराई जाने वाली सूचनाएं


स्टाम्प व निबन्धन विभाग द्वारा दी जाने वाली उपरोक्त सेवाओं का लाभ उठाने के सम्बन्ध में यदि किसी भी व्यक्ति को किसी प्रकार का मार्गदर्शन चाहिए, तो वह ‘‘सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005‘‘ के अन्र्तगत की गई व्यवस्थाओं के अनुसार सम्बन्धित कार्यालय में आवेदन-पत्र देकर आवश्यक जानकारी प्राप्त कर सकता है। इसी सन्दर्भ में विभाग द्वारा अनिवार्य रूप से सूचना दिये जाने वाले विषयों को भी चिन्हित किया गया है। इन विषयों के बारे में कोई भी सूचना आवश्यकतानुसार सम्बन्धित कार्यालयों द्वारा निःशुल्क उपलब्ध कराई जायेगी। यह विषय निम्नवत् हैं:-

क- सचिवालय स्तर पर


(अ)- विभाग से सम्बन्धित शिकायतों के मामले में विभाग द्वारा लिये गये निर्णय की सूचना तथा ऐसा निर्णय किन तथ्यों के आधार पर लिया गया है, इसकी जानकारी। (ब)- विभाग के अन्तर्गत, विभिन्न प्रक्रियाओं, मार्ग-निर्देशों की जानकारी, जैसे बैनामा करने की प्रक्रिया, स्टाम्प वाद की सुनवाई तथा रिवीजन की प्रक्रिया, स्टाम्प खरीदने की प्रक्रिया, अप्रयुक्त स्टाम्प की धनराषि को वापस करने की प्रक्रिया, विभिन्न अभिलेखों के पंजीयन हेतु स्टाम्प की दरंे तथा फर्जी स्टाम्पों की पहचान की जानकारी।

ख- फील्ड के कार्यालयों के स्तर पर


(अ)- विभाग से सम्बन्धित शिकायतों के मामले में, विभाग द्वारा लिये गये निर्णय की सूचना तथा ऐसा निर्णय किन तथ्यों के आधार पर लिया गया है, इसकी जानकारी।
(ब)- विभाग के अन्तर्गत, विभिन्न प्रक्रियाओं, मार्ग-निर्देशो की जानकारी, जैसे बैनामा करने की प्रक्रिया, स्टाम्प-वाद की सुनवाई तथा रिवीजन की प्रक्रिया, स्टाम्प खरीदने की प्रक्रिया अप्रयुक्त स्टाम्प की धनराषि को वापस करने की प्रक्रिया, विभिन्न अभिलेखों के पंजीयन हेतु निष्चित स्टाम्प षुल्क की दरें तथा फर्जी स्टाम्पों की पहचान की जानकारी।
(स)- सम्पत्ति के मूल्यांकन सम्बन्धी सूचनाएंे-कलेक्टर रेट लिस्ट की जानकारी।
(द)- विलेखों का पंजीयन न किये जाने अथवा उसका सन्दर्भण किये जाने दशा में ऐसा करने के कारणों की जानकारी।
(य)- पंजीकृत विलेखों की प्रतिलिपि प्राप्त करने सम्बन्धी जानकारी।


5- समयबद्व सेवाओं की सुनिश्चितता तथा शिकायतों की व्यवस्था


विभाग द्वारा समयबद्व सेवाएंे उपलब्ध कराना सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न सेवाओं को प्रदान करने की समय सीमाएंे निर्धारित कर दी गयी है। जिला निबन्धक के कार्यालय, कलेक्टर के कार्यालय तथा उप निबन्धक के कार्यालय से सम्बन्धित समय सीमाओं का विवरण परिशिष्ट - 1, 2, एवं 3 में दिया गया है।
यदि विभाग की सेवाओं तथा कार्यकलाप के सम्बन्ध में किसी भी व्यक्ति को कोई शिकायत हो, तो उसे चाहिए कि वे सम्बन्धित कार्यालय के प्रभारी अधिकारी से सीधे सम्पर्क करें तथा अपनी समस्या बतायें। यदि उसकी समस्या का समाधान न हो, तो उसे उच्च स्तर पर विभागाध्यक्ष अथवा शासन में प्रमुख सचिव, कर एवं निबन्धन विभाग से शिकायत करनी चाहिए। शिकायत सीधे उपस्थित होकर अथवा टेलीफोन, फैक्स द्वारा, लिखित एवं मौखिक रूप से की जा सकती है। कोई भी शिकायत अपना नाम व पता गोपनीय रखते हुए भी की जा सकती है। यथासम्भव किसी भी शिकायत के सम्बन्ध में प्रमाण भी उपलब्ध कराना चाहिए। किसी भी दशा में बिचैलियों तथा दलालों से बचना चाहिये एवं उनका सहयोग प्राप्त करके कोई कार्य नही कराना चाहिए। किसी भी दशा में कार्य के लिए विभाग के किसी कर्मी को घूस अथवा प्रलोभन नहीं देना चाहिए और यदि कोई कर्मी इसकी माॅग करे, तो उसके सम्बन्ध में निश्चित रूप से उपरोक्तानुसार शिकायत करनी चाहिए। शिकायतें दर्ज करने के लिए समस्त जिला कार्यालयों, मुख्यालाय तथा शासन के टेलीफोन नम्बर की लिस्ट परिशिष्ट - 4 पर दी गयी है। बाद में ई-मेल सेवा की भी व्यवस्था हो जाने पर शिकायतें ई-मेल द्वारा भी भेजी जा सकती हैं। परिषिश्ट-5 में ऐस 106 सदर उप निबन्धक कार्यालयों की सूची अवलोकनीय है जिसमें एन0आई0सी0, उत्तर प्रदेष एकक, लखनऊ द्वारा विकसित प्रेरणा साफ्टवेयर की सहायता से कम्प्यूटरीकृत प्रक्रिया से विलेखों का पंजीकरण किया जा रहा है। परिशिष्ट - 6 में मूल स्टाम्पों पर अंकित पहचान के चिन्ह दिये गये हैं।

परिशिष्ट-1


जिला निबन्धक/जिला स्टाम्प अधिकारी कार्यालय द्वारा प्रदत्त सेवाओं की समयावधि


परिशिष्ट-2


कलेक्टर स्टाम्प के कार्यालय -जिलाधिकारी, अपरजिलाधिकारी(वित्त एवं राजस्व),सहायक


स्टाम्प आयुक्त, परगनाधिकारी आदि द्वारा प्रदत्त सेवाओं की समयावधि


परिशिष्ट-3


उप निबन्धक कार्यालय द्वारा प्रदत्त सेवाओं की समयावधि


विक्रय पत्र आदि पंजीकृत कराने से पूर्व व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी


विक्रय पत्र/अन्तरण पत्र/अनुबन्ध पत्र आदि को तैयार करने से पूर्व विकेता/प्रथम पक्ष तथा क्रेता/द्वितीय को निम्न अभिलेख आदि उपलब्ध कराना आवष्यक है।
(1) विक्रेता/प्रथम पक्ष-क्रेता /द्वितीय पक्ष के तीन पासपोर्ट आकार के फोटोग्राफ,
(2) विक्रेता/प्रथम पक्ष का पिछला बैनामा (यदि उपलब्ध हो), अनुबन्धपत्र (यदि हो तो) की मूल प्रति।
(3) कृशि भूमि के अन्तरण हेतु तहसील से भूमि किस्म प्रमाण पत्र, खसरा, खतौनी की नकल तथा 200 मीटर की त्रिज्या में स्थित भूखण्ड या अचल सम्पत्ति का नक्षा, (चाहे वह हाथ से ही बना हो),
(4) स्थानीय निकाय के अन्तर्गत भवन है तो स्थानीय निकाय का कर विशयक प्रमाणपत्र, अचल सम्पत्ति के दो फोटाग्राफ तथा नक्षा,
(5) यदि अन्तरणपत्र पांच लाख रूपये से अधिक धनराषि का है तो आयकर पैनकार्ड की प्रति तथा यदि पैन कार्ड नहीं बना है, तो आयकर फार्म 60 या फार्म 61 भर कर देना,
(6) यदि विलेख रू015,000/- तक के स्टाम्प पेपर पर लिखा जाना है तो अनुज्ञप्ति धारक स्टाम्प विक्रेता से स्टाम्प पेपर क्रय किया जा सकता है। रू015,000/- से कम/अधिक धनराषि का स्टाम्प पेपर कोशागार/ उप-कोशागार के कैष काऊन्टर से भी क्रय किया जा सकता है।
(7) सब रजिस्ट्रार कार्यालय में विक्रेता, क्रेता के अतिरिक्त उनकी (विक्रेता क्रेता की) पहचान करने हेतु दो गवाहों के साथ उपस्थित होना पड़ता है यदि सब रजिस्ट्रार कार्यालय एवं कोशागार एक ही कैम्पस में स्थित है तो 20 मिनिट में स्टाम्प पेपर मिल जाता है। यदि सब रजिस्ट्रार कार्यालय एवं स्थानीय कोशागार दूर स्थित हैं तो आने जाने मे समय लगता है।
(8) दस्तावेज को व्यक्ति स्वयं लिख सकता है। इसके अतिरिक्त अनुज्ञप्ति प्राप्त दस्तावेज लेखक या बार काऊन्सिल में पंजीकृत अधिवक्ता द्वारा दस्तावेज लिखकर तैयार किये जा सकते हैं। विभागीय वेबसाइट से दस्तावेज का प्रोफार्मा डाऊनलोड कर दस्तावेज तैयार की जा सकती है
(9) दस्तावेज लिखे जाने के पष्चात उस पर फोटो चस्पा कर, पक्षकार व गवाहों का हस्ताक्षर किया जाता है तत्पष्चात उसके प्रत्येक पृश्ठ की दोनों ओर से फोटोप्रति करायी जाती है। यदि बिजली आ रही है तो फोटोकापी की दुकान पर यह कार्य तुरन्त हो जाता है। यदि बिजली नहीं है तथा प्राइवेट फोटोकापी की दुकान पर जेनरेटर उपलब्ध है तो उस फोटोकापी मषीन पर फोटोकापी करायी जाती है। दस्तावेज की फोटोकापी पर पक्षकारों का दोबारा हस्ताक्षर कराकर एवं उनका निषानी अंगूठा लिया जाता है। (10) उपरोक्त कार्यवाही पूर्ण कराना पक्षकारों का दायित्व है जिसके पष्चात ही दस्तावेज सब रजिस्ट्रार कार्यालय में पंजीकरण हेतु प्रस्तुत होता है।
(11) सब रजिस्ट्रार कार्यालय में दस्तावेजों को सीरियल से पंजीकृत किया जाता है। नम्बर आने पर सब रजिस्ट्रार कार्यालय में पक्षकार दस्तावेज पंजीकरण हेतु प्रस्तुत करते हैं। प्रस्तुतिकरण के समय निबन्धन षुल्क नकद धनराषि के रूप में वसूल कर उसकी रसीद दी जाती है। इसके पष्चात पक्षकारांे से दस्तावेज के निश्पादन के सम्बन्ध में उनका बयान लिया जाता है। प्रतिफल प्राप्ति के सम्बन्ध में विवरण बयान के साथ अंकित किया जाता है तथा पक्षकार की पहचान हेतु दो साक्षी की गवाही फोटोग्राफ तथा रजिस्टर में निषानी अंगूठा लिया जाता है।
(12) सब रजिस्ट्रार द्वारा पृश्ठांकन की कार्यवाही के पष्चात दस्तावेज कार्यालय द्वारा दस्तावेज में सीरियल नम्बर अंकित किया जाता है तथा उसकी पेंजिग की जाती है। इसके पष्चात दस्तावेज की रजिस्ट्री का प्रमाणपत्र अंकित किया जाता है। तदोपरान्त उप निबन्धक द्वारा प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर किया जाता है एवं प्रत्येक पृश्ठ पर मोहर लगायी जाती है। इस कार्यवाही के पष्चात दस्तावेज की फोटो प्रतिलिपि पर भी मूल की भांति सभी कार्यवाही करने के पष्चात प्रमाणपत्र अंकित किया जाता है। फोटोप्रति को कार्यालय में रखकर मूल दस्तावेज पक्षकार को वापसी हेतु तैयार हो जाती है।
(13) यदि दस्तावेज पूर्वाह्न में पंजीकरण हेतु प्रस्तुत की जाती है तो उसे उसी दिन सायः तक क्रेता को वापस कर दिया जाता है। यदि दस्तावेज अपराह्न में पंजीकरण हेतु प्रस्तुत की जाती है तो भी उसे उसी दिन अथवा अगले कार्यदिवस पर क्रेता को वापस कर दिया जाता है।
(14) 106 सदर सब रजिस्ट्रार कार्यालयों में (सूची परिषिश्ट-5) प्रलेख का निश्पादन स्वीकार करने/निबन्धन के 30 मिनिट के अन्दर ही पक्षकार को वापस मिल जाता है।


परिशिष्ट-4


स्टाम्प एवं रजिस्ट्रेशन के अधिकारियों के टेलीफोन एवं फैक्स नम्बर का विवरण


परिषिश्ट -5


106 सदर उप निबन्धक कार्यालयों की सूची जिनमें एन0आई0सी0, उत्तर प्रदेष एकक,


लखनऊ द्वारा विकसित प्रेरणा साफ्टवेयर की सहायता से कम्प्यूटरीकृत प्रक्रिया से विलेखों


का पंजीकरण किया जा रहा है।


इधर प्रदेष में लेखपत्रों में जाली स्आम्पों का प्रयोग कर रजिस्ट्री कराने के सम्बन्ध में षिकायतें इतने अधिक मात्रा में प्राप्त हो रही हैं कि यह मामला षासन एवं विभाग के लिए एक चिन्ता का विशय बन गया है। बहुधा यह पाया गया है कि जाली स्आम्पों का प्रयोग उप-निबन्धक कार्यालयों के अतिरिक्त बैंकों आदि से ऋण लेने वाले लेखपत्रों में बहुतायत से किया जा रहा है क्योंकि इस प्रकार के लेखपत्र निबन्धन अधिकारियों के समक्ष न तो प्रस्तुत होते हैं और न उनका परीक्षण ही हो पाता है।
उपरोक्त स्थिति से निपटने के लिए इस बात की आवष्यकता है कि इस सम्बन्ध में पूर्ण सतर्कता बरती जाय एवं जाली स्टाम्पों तथा जाली कोर्टफीस के टिकटों के प्रचलन के रोकथाम का कारगर ढंग से उपाय किया जाय। लेखपत्रों के निबन्धन हेतु प्रस्तुत होने पर उनमें प्रयुक्त स्टाम्प पेपरों का सूक्ष्मता से परीक्षण इस दृश्टिकोण से किया जाय कि कहीं जाली स्टाम्प पेपर तो प्रयोग नहीं किये गये हैं। परिशद से इस सम्बन्ध में पहले भी निर्देष भेजे जा चुके हैं। उसी क्रम में निम्न बिन्दु जाली स्टाम्पों की पहचान एवं रोकथाम की कारगर कार्यवाही के लिए इंगित किये जा रहे हैंः-
1. स्टाम्पों का मुद्रणः- भारतीय प्रतिभूति मुद्रणालय नासिक में स्टाम्प पेपरों का मुद्रण ‘‘आफसेट’’ पद्धति द्वारा किया जाता है जिसमें समस्त डिजाइन तथा रेखायें बहुत ही स्पश्ट एवं चमकीली होती हैं। जाली स्टाम्पों का मुद्रण कू्रड ढंग से किया जाता है जिससे रेखायें अस्पश्ट टूटी हुई तथा एक दूसरे पर चढी हुई रहती हैं। सफाई का रंग भद्दा कहीं पर कम तथा कहीं पर अधिक रहता है। इस तथ्य को आवर्धक लेन्स मेगनीफाइंग लेन्स से देखा जा सकता है और सूक्ष्म परीक्षण से असली तथा जाली स्टाम्पों की पहचान सरलता से की जा सकती है। अभी हाल में मुरादाबाद तथा आगरा में पकड़े गये जाली स्टाम्प पेपरों को देखते हुए ज्ञात हुआ कि अधिकतर रु0 100/- के असली स्टाम्प पेपर को रु0 500/- तथा रु0 750/- का जाली स्टाम्प बनाकर विक्रय किया गया है। इसके लिए अंक तथा षब्दों का पुर्न मुद्रण (ब्लाक) बनाकर किया गया है जो प्रकरण में देखने से स्पश्ट हो जाता है। ऐसी ही प्रक्रिया रु0 1000/- के मूल्य के स्टाम्पों में भी करके उन्हें रु0 3000/- तथा रु0 5000/- का बनाया गया है। अतः इस सम्बन्ध में विषेश सावधानी बरतने की आवष्यकता है।
2. रंगः- असली स्टाम्पों का रंग चमकीला तथा स्पश्ट होता है जबकि जाली स्टाम्पों का रंग भद्दा तथा बिखरा होता है। यह रंग कहीं हल्का कहीं गाढ़ा दिखाई देता है। यह तथ्य भी आवर्धक लेन्स द्वारा देखे जाने पर स्पश्ट हो जाते हैं। 3. वाटर मार्कः- स्टाम्प पेपरों को प्रकाष की ओर करके देखने से स्पश्ट इंगित हो जायेगा कि स्टाम्प पेपर में वाटर मार्क के चिन्ह तारे अथवा अषोक चक्र बने हैं या नहीं । वाटर मार्क के कागज ही स्टाम्प पेपर छापने के प्रयोग में लाये जाते हैं। वाटर मार्क का चिन्ह कारखानों में स्टाम्प पेपरों के लिए कागज निर्माण के समय ही डाल दिया जाता है। यह चिन्ह अन्य कागजों में नहीं बनाया जा सकता है। यह जाली और असली स्टाम्प पेपरों की पहचान के लिए एक महत्वपूर्ण बिन्दु है।
4. (परकोरेषन) परिछिद्रणः- कोर्टफीस के टिकटों में एक विषेश मषीन द्वारा निष्चित संख्या में परिछिद्रण किया जाता है। जिन टिकटों के परिछिद्रण साफ नहीं हैं और निर्धारित संख्या से घटे या बढ़े हों तो यह समझना चाहिए कि यह टिकट जाली है। भारत प्रतिभूति मुद्रणालय के अतिरिक्त अन्य किसी मुद्रणालयों में इतने साफ एवं बारीकी से परिछिद्रण करने की व्यवस्था नहीं है। उपरोक्त इंगित लक्षणों को ध्यान में रखते हुए स्टाम्प पेपरों के परीक्षण से एक सामान्य व्यक्ति को भी जनरल स्टाम्पों एवं कोर्टफीस के टिकटों के असली तथा जाली होने की पहचान सरलता से हो सकती है। जाली टिकटों के प्रयोग से षासन को न सिर्फ स्टाम्प राजस्व में हानि उठानी पड़ रही है बल्कि उससे सामाजिक भ्रश्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है और षासन की छवि भी धूमिल हो रही है। अतः आपसे अनुरोध है कि अपने अधीन सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों को यह निर्देष देने का कश्ट करें कि लेखपत्रों के रजिस्ट्री हेतु प्रस्तुत होने पर स्टाम्पों के असली तथा जाली होने का परीक्षण उपरोक्त दिये गये बिन्दुओं के आधार पर अवष्य करें और उन्हें यदि किसी प्रकार का सन्देह हो तो विक्रेता स्टाम्प वेण्डर का विक्रय रजिस्टर तुरन्त देखें तथा स्टाम्प पेपर को परीक्षण कराने हेतु राजस्व परिशद अवष्य भेजें। कृपया इन निर्देषों का अनुपालन कड़ाई से सुनिष्चित करें तथा इस कुप्रथा को रोकने में सहयोग करें। अन्य कार्यालयों में प्रयोग होने वाले स्टाम्पों की भी इसी गहनता से जांच की जानी चाहिए।