स्टाम्प प्रशासन


स्टाम्प प्रशासन की कोई एकमात्र स्वतन्त्र व्यवस्था राज्य सरकार द्वारा नहीं की गयी है, बल्कि भारतीय स्टाम्प अधिनियम,1899 के प्राविधानों को लागू करने के लिए निर्धारित विभागीय अधिकारियों सहित अन्य लोक सेवकों को भी भारतीय स्टाम्प अधिनियम,1899 के प्राविधानों के अधीन स्टाम्प देयता का परीक्षण करने तथा उसे समुचित रूप से स्टाम्प लगवाने के लिए उत्तरदायी बनाया गया है। इस सन्दर्भ में भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899, किसी एक विषेश विभाग का कार्यक्षेत्र न होकर उन सब विभागों से सम्बन्धित अधिनियम है, जिनमें स्टाम्प का प्रयोग किसी लेखपत्र में किया जाता है। इस अधिनियम के प्राविधानों के अन्र्तगत विलेखों पर समुचित स्टाम्प षुल्क की देयता सुनिष्चित कराना/करना , ऐसे समस्त अधिकारीगण की जिम्मेदारी है, जिनके सामने उनके कार्य के सम्बन्ध में विलेख प्रस्तुत होते हैं। अधिकतम स्टाम्प राजस्व का अर्जन, अकेले स्टाम्प एवं निबन्धन विभाग द्वारा ही किया जा रहा है।

उद्देष्य


स्टाम्प अधिनियम राजस्व अर्जित करने के उद्देष्य से अधिनियमित किया गया है तथा यह राजस्व कुछ निष्चित वर्गों के विलेखों पर स्टाम्प षुल्क प्रभार्य करके प्राप्त किया जाता है। विगत पन्द्रह वर्शों में विभाग द्वारा अर्जित राजस्व एवं विभाग में रजिस्ट्रीकृत लेखपत्रों की संख्या की तालिका में वर्णित है।

रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908


इतिहास एवं उद्देष्य


इतिहास: पूर्व में लेखपत्रों के रजिस्ट्रीकरण का कार्य षहर के काज़ी द्वारा सम्पादित किया जाता था ब्रिटिष राज्य में वर्श 1773 में प्रथम बार रजिस्ट्रीकरण के कार्य हेतु गवर्नर जनरल द्वारा लेखपत्रों के रजिस्ट्रीकरण की प्रणाली प्रारम्भ की गई। वर्श 1864 में रजिस्ट्रीकरण अधिनियम पारित किया गया जिसमें कुछ लेखपत्रों का रजिस्ट्रीकरण अनिवार्य किये जाने की व्यवस्था की गई। रजिस्ट्रीकरण के सम्बन्ध में कई आदेष/निर्देष पारित करने के पष्चात वर्श 1908 में रजिस्ट्रीकरण अधिनियम संहिताबद्ध किया गया तथा यह अधिनियम संख्या 16 दिनांक 01.01.1909 से रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 के रूप में वर्तमान में प्रभावी है।

उद्देष्य


रजिस्ट्रीकरण विभाग का मूल कर्तव्य पक्षकारों के मध्य हुई संविदा से सम्बन्धित प्रलेखों का रजिस्ट्रीकरण करना तथा स्वत्व के अभिलेखों को षाष्वत काल तक सुरक्षित रखना है। विभाग द्वारा ऐसे प्रलेखों की प्रतिलिपि भी निर्धारित षुल्क प्राप्त कर प्रदान की जाती है। मूल विलेख के खो जाने पर अथवा नश्ट हो जाने पर रजिस्ट्रीकरण विभाग में उपलब्ध प्रतिलिपियां ही विधिक रूप से मूल विलेखों के तुल्य मानी जाती हैं।

वर्तमान भारतीय स्टाम्प अधिनियम,1899(एक्ट संख्या-दो सन् 1899)


(क) इतिहास:


इस समय भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 (अधिनियम संख्या दो सन् 1899) दिनांक 27 जनवरी, 1899 से प्रभावी है। उक्त नये अधिनियम को बनाये जाने के दो कारण थे- पहला यह है कि पूर्व अधिनियमित स्टाम्प अधिनियमों में विभिन्न श्रेणी के विलखों पर देय स्टाम्प षुल्क के सम्बन्ध में अपेक्षित स्पश्टता नहीं थी। दूसरा कारण यह था कि स्टाम्प विधि अन्य राजस्व विधियों से इस सन्दर्भ में बहुत भिन्न है कि अन्य राजस्व विधि में अधिवक्तागण विधि को परिभाशित करने में न्यायालय की सहायता करते हैं जबकि स्टाम्प विधि में विभिन्न विलेखों पर स्टाम्प षुल्क की देयता परिभाशित करने का दायित्व केवल न्ययालय पर ही नहीं, बल्कि आम आदमी पर भी होता है। अतः यह आवष्यक समझा गया कि स्टाम्प अधिनियम से सम्बन्धित व्यवस्थाओं को इतना अधिक स्पश्ट कर दिया जाये कि आम आदमी उसे आसानी से समझ सके तथा ऐसे लोग जो स्टाम्प अपवंचन का कोई आषय नहीं रखते हैं, आसानी से अपने विलेखों पर उचित स्टाम्प ड्यूटी का निर्धारण करते हुए उसे अदा कर सके तथा उन्हें इस सम्बन्ध में कोई संषय भी न रहे। साथ ही साथ अपने मुवक्किल के लिए काम करते हुए किसी अधिवक्ता के लिए भी इतना स्पश्ट रहे कि वे उसका काम न्यूनतम सम्भव कठिनाई से कर सकें तथा प्रष्नगत विलेख पर उचित स्टाम्प षुल्क अदा हो जाये।

(ख) उद्देष्य


(i) भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 स्टाम्प राजस्व अर्जित करने के उद्देष्य से अधिनियमित किया गया है तथा यह राजस्व उक्त अधिनियम की अनुसूची एक, एक-ए, एक-बी में अंकित निश्चित वर्ग में विलेखों पर स्टाम्प षुल्क के रूप में प्रभार्य करके प्राप्त किया जाता है। (ii) भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 के प्राविधान कड़े रखे गये हैं ताकि विधि के अनुसार वांछित राजस्व राज्य को मिल सके तथा स्टाम्प षुल्क अपवंचन की सम्भावना को भी रोका जा सके। (iii) भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 में यह भी व्यवस्था की गयी है कि किसी विलेख पर देय स्टाम्प षुल्क की धनराषि के सम्बन्ध में संषय होने की स्थिति में, नियमानुसार षुल्क अदा करने वाले व्यक्ति के पक्ष में निर्णय किया जाये। (ग) व्यवस्था: भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 में यह व्यवस्था है कि राज्य सरकारें उक्त अधिनियम की व्यवस्थाओं को भारत के संविधान की अनुसूची -सात की तीनों सूचियों की सीमाओं में अपने राज्यों में लागू करने के लिए यथावष्यक संषोधन निर्धारित प्रक्रिया एवं सीमाओं में कर सकेगी। उपरोक्तानुसार वर्तमान स्वरूप में उत्तर प्रदेष में यथासंषोधित भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 लागू है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि स्टाम्प ड्यूटी की अवधारणा ही राज्य के लिए राजस्व अर्जन के उद्देष्य से थी, आज भी वही है, बल्कि यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि उक्त अधिनियम वर्तमान में राज्य के लिए राजस्व अर्जन करने से सम्बन्धित अधिनियमों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण अधिनियमों में से एक है तथा स्टाम्प राजस्व के माध्यम से राज्य सरकार को प्राप्त होने वाले राजस्व राज्य के कुल राजस्व अर्जित करने वाले श्रोतों में दूसरा स्थान रखता है। वर्श 2009-10 में स्टाम्प राजस्व की उपलब्धि 4445.11 करोड रूपये रही है। इससे सहज ही इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार के लिए राजस्व जुटाने में इसका कितना महत्व है।